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HOME REMEDIES Part 2

चमत्कारी जड़ी बूटियाँ भाग 2


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दादी माँ के नुख्से

 

अर्श रोग :त्रिकुट युक्त घृत को तिगुने पलाश भस्म -युक्त जल में सिद्ध करके पीना है।

उपदंश की शांति : त्रिफला के क्वाथ या भ्रंग राज के रस से व्र णों को धोयें। परवल की पत्ती के चूर्ण  के साथ अनार की छाल या गज पीपर या त्रिफला का चूर्ण उस पर छोड़ें ।

वमन(उल्टी) : त्रिफला, लोह्चूर्ण, मुलहटी, आर्कव, (कुकुरमांगरा ), नील कमल, कालि मिर्च और सैन्धव नमक सहित पकाये हुए तैल  के मर्दन से वमन की शांति होती है ।

वमन कारक : मुलहठी, बच, पिप्पली-बीज, कुरैया की छाल का कल्क और नीम का क्वाथ घौंट देने वमन कारक होता है।

बाल पकने-सफ़ेद होने से रोकना : दूध, मार्कव-रस, मुलहटी और नील कमल, इनकी दो सेर मात्रा को  पका  कर एक पाव तैल में बदल कर नस्य का प्रयोग करे।

ज्वर, कुष्ठ, फोड़ा, फुंसी, चकत्ते: नीम की छाल, परवल की पत्ती , गिलोय, खैर की छाल , अडूसा या चिरायता, पाठा , त्रिफला और लाल चन्दन।

ज्वर और विस्फोटक रोग : परवल की पत्ती, गिलोय, चिरायता, अडूसा, मजीठ एवं पित्त पापड़ा-इनके क्वाथ में खदिर मिलाकर लिया जाये।

ज्वर, विद्रधि तथा शोथ : दश मूल, गिलोय, हर्रे, गधह पूर्णा , सहजना  एवं सौंठ ।

व्रण शोधक : महुआ और नीम की पत्ती  का लेप

बाह्य शोधन : त्रिफला (हेड़, बहेड़ा, आंवला), खैर (कत्था), दारू हल्दी, बरगद की छाल , बरियार, कुशा, नीम की पत्ते तथा मूली के पत्ते का क्वाथ।

घाव के क्रमि नष्ट करना: करंज , नीम, और मेउड़  का रस।

व्रण रोपण : धय का फूल, सफ़ेद चन्दन, खरेठी , मजीठ , मुलहठी, कमल, देवदारु, तथा मेद घाव को भरने वाले हैं ।

नाड़ी व्रण, दुष्ट व्रण, शूल और भगन्दर : गुग्गुल, त्रिफला, पीपल, सौंठ, मिर्च, पीपर  इन सबको समान भाग में पीस कर घृत में मिला कर प्रयोग करें।

कफ और वात रोग : गौ मूत्र में भिगोकर शुद्ध की हुई हरीतकी (छोटी हर्र) को रेडी के तेल में भून कर सैंधा नमक के साथ प्रात प्रति दिन प्रयोग करें। ऐसी हरितकी कफ व वात से होने वाले रोगों को नष्ट करती है।

कफ प्रधान व वात प्रधान प्रकृति वाले मनुष्यों के लिए : सौंठ,मिर्च,पीपल और त्रिफला का क्वाथ यवक्षार और लवण मिलाकर पीने से विरेचन का काम करता है और  कफ वृधि को रोकता है।

आम वात नाशक : पीपल, पीपला मूल , वच , चित्रक व सौंठ का क्वाथ या पेय बनाकर पियें।

वात एवं संधि, अस्थि एवं मज्जा गत, आमवात : रास्ना, गिलोय, रेंडकी की छाल, देवदारु,और सौंठ का क्वाथ में पीना चाहिये अथवा सौंठ के जल के साथ दशमूल का क्वाथ पीना चाहिये।

आम वात, कटिशूल और पांडु रोग : सौंठ,एवं गोखरू का क्वाथ प्रतिदिन प्रात: सेवन करना है। शाखा एवं पत्र सहित प्रसारिणी (छुई मुई ) का तैल भी इस रोग में लाभप्रद है।

वातरक्त रोग : गिलोय का स्वरस, कल्क , चूर्ण या क्वाथ का दीर्घ कल तक प्रयोग।

वातरक्त नाशक : वर्धमान पिप्पली या गुड़ के साथ हर्रे का सेवन करना चाहिए।

वातरक्त-दाहयुक्त रोग : पटोल्पत्र, त्रिफला, राई, कुटकी, और गिलोय का पाक तैयार करें।

वातजनित पीड़ा : गुग्गुल को ठन्डे-गरम जल से, त्रिफला को सम शीतोष्ण जल से अथवा खरेठी, पुनर्नवा, एरंड मूल, दोनों कटेरी, गोखरू, का क्वाथ, हींग  तथा लवण  के साथ। एक तोला पीपला मूल,सैन्धव , सौवर्चल, विड्, सामुद्र एवं औद्भिद-पाँचों नमक, पिप्पली,चित्ता, सौंठ, त्रिफला, निशोथ, वच, यवक्षार, सर्जक्षार, शीतला, दंती, स्वर्ण क्षीरी(सत्य नाशी) और काकड़ा सिंगी -इनकी बेर के बराबर गुटिका बनायें और कांजी के साथ सेवन करें -शोथ तथा उससे हुए में भी इसका सेवन करें । उदर वृद्धि में निशोथ का प्रयोग न करें।

शोथ नाशक : दारू हल्दी, पुनर्नवा तथा सौंठ-इनसे सिद्ध किया हुआ दूध।

शोथ का हरण : मदार, पुनर्नवा (-गदह्पुर्ना) एवं चिरायता के क्वाथ से सेंक करने पर।

गलगंड और गलगंड माल : फूल प्रियंगु, कमल, सँभालू, वायविडंग, चित्रक, सैंधव लवण, रास्ना, दुग्ध, देवदारु और वच से सिद्ध चौगुना कटु द्रव्य युक्त तैल मर्दन करने से (या जल के साथ ही पीसकर लेप करने से)।

टी.बी या क्षय रोग : कचूर,नागकेसर, कुमुद का पकाया हुआ क्वाथ तथा क्षीर विदारी,पीपल और अडूसा का कल्क दूध के साथ पका कर लेने से लाभ होता है।

गुल्म रोग, उदर रोग, शूल और कास रोग: वचा, विडलवण,अभया (बड़ी हर्रे), सौंठ,हींग, कूठ ,चित्रक और अजवाइन, इनके क्रमश: दो, तीन, छ:, चार, एक, सात, पाँच और चार भाग ग्रहण करके चूर्ण बनायें।

गुल्म और पलीहा : पाठा, दन्ती  मूल, त्रिकटु (सौंठ,मिर्च, पीपल) त्रिफला और चित्ता  का चूर्ण गौमूत्र के पीस कर गुटिका बनालें ।

कृमि नाशक : वाय विडंग का चूर्ण शहद के साथ।  या विडंग, सैंधा नमक, यव क्षार एवं गौमूत्र के साथ हर्रे भी लेने पर।

रक्तातिसार : शल्लकी (शाल विशेष ), बेर, जामुन, प्रियाल, आम्र और अर्जुन -इन वृक्षौं की छाल का चूर्ण बना कर मधु में मिला कर दूध के साथ लेना है

अतिसार : कच्चे बेल का सूखा गूदा, आम की छाल, धाय का फूल, पाठा, सौंठ और मोच रस (कदली स्वरस )-इन सबका समान भाग लेकर चूर्ण बना लें गुड मिश्रित तक्र के साथ पीयें।

 गुद  भ्रंश रोग : चान्गेरी, बेर, दही का पानी, सौंठ और यवक्षार-इनका घृत सही क्वाथ पीने से।

प्रदर रोग : मजीठ, धाय के फूल, लोध, नील कमल-इनको दूध के साथ स्त्रियों को लेना चाहिये।

 प्रदर रोग नाशक : पीली कट सरैया, मुलहठी और चन्दन ।

गर्भ स्थिर करना : श्वेत कमल  और नील कमल की जड़ तथा मुलहठी , शर्करा और तिल-इनका चूर्ण का इसतेमाल करने से गर्भपात की आशंका होने पर गर्भ को स्थिर करने में सहायक है ।

शिरो रोग का नाश : देव दारू, अभ्रक, कूठ, खस और सौंठ-इनको कांजी में पीस कर तैल मिला कर, लैप करने से शिरोरोग का नाश होता है ।

कर्ण शूल शमन : सैन्धव-लवण को तैल में सिद्ध करके छान लें -हल्का गरम तैल कान में डालने से फायदा होगा ।

कर्णशूल हारी : लहसुन, अदरक, सहजन और केला -इनमें से प्रत्येक का रस कर्णशूल हारी है।

तिमिर रोग नाशक : बरियार, शतावरी, रास्ना, गिलोय, कटसरैया और त्रिफला-इनको सिद्ध करके घृत का पान या इनके सहित घृत का उपयोग।

आँखों (-चक्षुश्य), ह्रदय, विरेचक और कफ रोग नाशक  :  (  त्रिफला, त्रिकुट एवं सेंधव नमक -इनसे सिद्ध किये हुए घृत का पान-आँखों, ह्रदय, विरेचक और कफ रोग नाशक – के लिए हितकर है।

दिनौंधी, रतौंधी : गाय के गोबर के रस के साथ नील कमल के पराग की गुटिका का अंजन ।

सर्व रोग नाशक चूर्ण व विरेचक :  हर्रे, सैन्धव लवण और पीपल -इनके समान भाग का चूर्ण गर्म जल के साथ लें । यह नाराच -संज्ञक चूर्ण सर्व रोग नाशक है ।

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