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HOME REMEDIES Part 1

चमत्कारी जड़ी बूटियाँ भाग 1
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दादी माँ के नुस्खे

वात ज्वर : बिल्वादि पंचमूल-बेल, सोनापाठा, गम्भार, पाटन, एवं अरणी का काढ़ा प्रयोग करें।
पाचन : पिप्पली मूल, गिलोय और सोंठ का क्वाथ प्रयोग करें।

ज्वर : आंवला, अभया (बडी हरड ), पीपल और चित्रक-यह आमल क्यादि  क्वाथ सब प्रकार के ज्वर का नाश करता है।

खांसी, ज्वर , अपाचन, पार्श्व शूल, और कास (खाँसी ) : दश मूल – बिल्वमूल, अरणी, सोनापाठा, गम्भारी, पाटल, शालपर्णी, गोखुरू, पृष्टपर्णी, बृहती, (बड़ी कटेरी) का क्वाथ व कुश के मूल का क्वाथ-प्रयोग करें।

वात और पित्त ज्वर :- गिलोय, पित्त पापड़ा, नगर मोथा, चिरायता, सौंठ-यह पञ्च भद्र क्वाथ, वात और पित्त ज्वर में देना चाहिये।

विरेचक व सम्पूर्ण ज्वर नाष्क :- निशोथ, इंद्राय्ण (इंद्र वारुणी ), कुटकी, त्रिफला, अमलतास का क्वाथ यवक्षार मिला कर पिलायें।

सभी प्रकार के कास रोग : देवदारु,खरेठी, अडूसा, त्रिफला, व्योष (सौंठ,काली मिर्च, पीपल), पद्मकाष्ठ वाय विडंग और मिश्री सभी सामान भाग में ले।

ह्रदय रोग, गृहणी, हिक्का, श्र्वाष, पार्श्व रोग व कास रोग :  दशमूल,कचूर, रास्ना, पीपल, बिल्व, पोकर मूल, काकड़ा सिंगी, भुई आंवला, भार्गी, गिलोय और पान इनसे विधि वत सिद्ध किया हुआ क्वाथ या यवागू का पान करें।

हिक्का -हिचकी रोग : मुलहठी(चूर्ण), के साथ पीपल, गुड के साथ नागर, और तीनों नमक (सैं धा  नमक, विड नमक, काला नमक)।

अरुचि रोग: कारवी अजाजी (काला जीरा-सफ़ेद जीरा), काली मिर्च, मुन्नका, वृक्षाम्ल (इमली), अनारदाना, काला नमक और गुड़, इन्हें सामान भाग में मिला कर चूर्ण को शहद के साथ निर्मित कारव्यादी बटी  का सेवन करें।

 कास रोग (खांसी ), श्र्वाष, प्रति श्याय (जुकाम) और कफ विकार : अदरक के रस के साथ मधु इनका  का नाश करते हैं।

प्यास और वमन -उल्टी : वट-वटा ङ्कुर, काकड़ा सींगी,  शिलाजीत, लोध, अनारदाना और मुलहटी के चूर्ण में सामान भाग में मिश्री मिला कर मधु के साथ अवलेह (चटनी) बनायें तथा चावल के पानी के साथ लें।

कफ युक्त रक्त, प्यास, खांसी एवं ज्वर : गिलोय, अडूसा, लोध और पीपलको शहद के साथ प्रयोग करें।

कास (बल्गमी खांसी) अदुसे का रस, मधु और ताम्र भस्म सामान मात्र में लें।

सर्प विष व कास : शिरीष पुष्प  के स्वर रस में भावित सफेद मिर्च लाभ प्रद हैं।

वेदना-दर्द-पीड़ा : मसूर सभी प्रकार की वेदना को नष्ट करता है।

पित्त दोष : चौंराई का साग सभी प्रकार के पित दोश को नाश करता है।

विष नाशक : मेउड़, शारिवा, सेरू  और अङ्कोल।

मूर्छा, मदात्यय रोग (बेहोशी) : सौंठ, गिलोय, छोटी कटेरी, पोकर मूल, पीपला मूल और पीपल का क्वाथ।

उन्माद : हींग, काला नमक एवं व्योष (सौंठ,मिर्च,पीपल), ये सब दो दो पल लेकर 4 सेर घृत और घृत  से 4 गुनी मात्रा  में गौ मूत्र में सिद्ध करने पर  प्रयोग करें।

उन्मादऔर अपस्मार रोग का नाश व मेधा वर्धक : शंख पुष्पी, वच, और मीठा कूट से सिद्ध ब्राह्मी रस को मिला कर इनकी गुटिका बना लें

कुष्ठ रोग कुष्ठ रोग मर्दन : परवल की पत्ती , त्रिफला, नीम की छाल, गिलोय, पृश्र्निपर्णी, अडूसे  के पत्ते के साथ तथा करज्ज -इनको सिद्ध करने वाला घृत। यह वज्रक कहलाता है।

कुष्ठ नाशक: हर्रे के साथ पंचगव्य या घृत का प्रयोग।

कुष्ठ नाशक, अस्सी प्रकार के वात रोग, चालीस प्रकार के पित्त रोग,और बीस प्रकार के क़फ़ रोग ,खांसी, पीनस (बिगड़ा जुकाम ), बबासीर और व्रण रोगों का नाश यह योगराज करता है : नीम की छाल, परवल, कंटकारी-पंचांग, गिलोय और अडूसा-इन सबको दस दस पल लेकर कूट लें । 16 सेर पानी में क्वाथ बनाकर उसमें सेर भर घृत और 2 0 तोले त्रिफला चूर्ण का कल्क बनाकर डाल दें और चतुर्थांश शेष रहने तक पकाएं।
 

Re: ok
  • By: Drhomeo on 03.08.17

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